कुछ दिन पहले घर पर अपनी लाइब्रेरी में रखी किताबों को दोबारा सही से लगा रहा था। इसी बीच मेरी नज़र एक पुस्तक पर गई जो प्रसिद्ध पब्लिकेशन "टाटा मैकग्रा हिल" की थी — नाम था "सर्किट डिज़ाइन एंड एनालिसिस"

सर्किट डिज़ाइन एंड एनालिसिस पुस्तक और फ्लॉपी डिस्क

इस पुस्तक को मैंने एमएससी में पढ़ने के दौरान दिल्ली के दरियागंज के मार्केट से खरीदा था। मुझे ध्यान आया कि इसमें तो एक फ्लॉपी डिस्क भी थी। तुरंत मैंने इसके बैक में लगे प्लास्टिक फोल्डर को खोला और एक फ्लॉपी डिस्क निकाली — देखते ही अतीत के MS-DOS बेस्ड कंप्यूटर की याद आ गई, क्योंकि ये वो समय था जब कंप्यूटर लोगों के लिए आम नहीं थे।

फ्लॉपी डिस्क का इस्तेमाल 90 के दशक के अंत और 2000 की शुरुआत में मुख्य स्टोरेज डिवाइस के रूप में होता था — जैसे आजकल हम सेमीकंडक्टर चिप का उपयोग डेटा स्टोरेज के लिए करते हैं। यह एक हार्डवेयर डिवाइस थी जिसे आजकल की डीवीडी / पेन ड्राइव / मेमोरी कार्ड की तरह साथ ले जाया जा सकता था, और यह चुंबकीय माध्यम के रूप में डेटा को स्टोर और रीड कर सकती थी।

फ्लॉपी डिस्क ड्राइव का आविष्कार 1967 में एलन शुगार्ट ने IBM कंपनी में किया था। यह 8 इंच की डिस्केट थी — पहले प्रकार का पोर्टेबल हार्डवेयर स्टोरेज डिवाइस। शुरुआती फ्लॉपी केवल 80KB डेटा स्टोर कर सकती थी। बाद में इसका आकार 5.25 इंच हुआ (800KB), और फिर 3.5 इंच की फ्लॉपी बनी जिसकी क्षमता 1.44MB थी।

समय के साथ MOS (Metal Oxide Semiconductor) फैमिली पर आधारित सेमीकंडक्टर चिप्स का विकास हुआ, जिनकी क्षमता MB से GB, फिर TB और अब PB की रेंज तक पहुँच गई — और फ्लॉपी डिस्क मार्केट से बाहर हो गई। लेकिन आज अगर हम फ्लॉपी जैसी तकनीक को भूलते हैं, तो यह वैसा ही होगा जैसे घर के किसी बुजुर्ग को भूल रहे हों।

जय हिंद, जय भारत।
— डॉ. अविनाश शर्मा, एमएससी पीएचडी (भौतिक विज्ञान)